4/07/2016

सुन मेरे पूरे( व्यंग्य कविता)

सुन मेरे पूरे, मैं तेरी
आधी "अर्धांगिनी"
तू कहलाता नर
मैं  कहलाती "नारी"
तू मुझसे बालिश्त
मैं तुझमें ही समाती
मेरी तुझसे होड़ नहीं
खुद को तुझ में ही ढालती
मुझसे ही तू बनता
और दुनिया मुझे बनाती
 तू है मेरा अवशेष
 मुझमें मेरा बचा न शेष
इठलाती-ठिठलाती
फिर तुझसे टकराती
दुनिया तेरी और मेरी
फिर तेरी मंशा मुझे डराती
ताक-ताक तुझको
टूक-टूक मैं जीती
तेरे ही सब खेल
नजरें तेरी मुझे लुभाती
तू सागर मैं नदिया
जाऊँ तुझ में बहती।।

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