8/31/2015

वाह रे मेरे देश!! ( व्यंग्य कविता)

वाह रे मेरे देश ।
कैसे -कैसे लोग और
कैसे-कैसे भेष॥
जगह -जगह पर
बैठे ढोंगी ।
रहते हैं ठाठ से
और कहलाते  योगी॥
कैसा फादर और
कहाँ का पीर।
मर गया इनकी
आंखों का नीर॥
पग-पग पर
झूठ का फेरा ।
मक्कारों ने आकर घेरा॥
"आप" के कजरी ।
"कॅाग्रेस" के पप्पू
इनके बीच,सोती
जनता है पहेली॥
कहते बाबा निर्मल।
यह मन है छल॥
खाओ रसगुल्ले 
और पहनो वस्त्र।
कृपा बरसेगी कल॥
हाये ये सोती जनता ।
मरता क्या न करता॥
खुली लूट की
मची है रेस।
वाह रे मेरे देश
वाह रे मेरे देश !!

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