कुछ दिन हुये शादियों का सीजन आ गया।साल भर में ऐसे सीजन दो बार जरुर आते हैं।इसी सीजन के चलते मेरी भाभी के भाई की शादी भी थी अब शादी रिश्तेदारी में थी जाना भी जरूरी था। घर में पति महोदय से बात चीत हुईं और तैयारी बन गयी जाने की ।अब तो बस एक ही धुन लगी शॅापिंग की। अब दो- तीन दिन बाज़ार जाना पड़ा सारी खरीददारी हो गयी।
याद आया जूते चप्पल की शॅापिंग रह गयी है। हम गये जूते 👞चप्पल 👡 की दुकान में दुकानदार हमें जूते 👞चप्पल 👡 दिखा ही रहा था। एक जोड़ी पसंद आयी उसका दूसरा पैर लेने वो अन्दर गया तभी मुझे सहसा एक आवाज आयी मैं आवाज सुनकर भौचक्की सी अपने दाये- बायें देखने लगी पर मुझे कुछ समझ न आया। फिर आवाज आयी तो कुछ समझ आया की आवाज़ मेरे ही पैरों की तरफ से आ रही थी । नीचे देखा तो आवाज जूते से आ रही थी ।
मैंने पूछा कौन- उसने कहा मैं जूता हूँ
मैंने पूछा तुम कैसे बोल रहे हो??
उसने कहा मैं अब बोलता भी हूँ और चलता भी हूँ।
मैंने पूछा वो कैसे ??
बोलते भी हो और चलते भी हो मेरे समझ से बाहर है।
जूता बोला..... जब मैं चलता हूँ मतलब चलाया जाता हूं तो दुनिया बोलने लगती है।
मेरी फिर भी समझ न आया।
फिर मैंने जूते को बोला भई अच्छे से समझाओ
तुम चलते हो तो दुनिया कैसे बोलने लगती है ??
फिर जूते ने कहा- वैसे तो मैं पैरों में ही पहना जाता हूँ पर आजकल मेरा द्वारा और भी एक पुण्य काम किया जाता है । और वो है राजनेताओं को ऊपर फेका जाना।और मैं जैसे ही फेका जाता हूँ वैसे ही दुनिया बोलने लगती है और जो फेकता है वह भी फेमस हो जाता है। ये काम मेरे जैसे ब्रांडेड और मेरे नॅानब्रांडेड भाइ लोगों द्वारा किया जाता है ।
मैंने पूछा मुझसे क्या चाहते हो मैं क्या कर सकती हूँ??वो गिडगिडाया और कहा मेरी आपसे हाथ जोड़ कल विनती है आप मुझे भी कहीं ऐसी जगह चलाये जहाँ पर मै मीडिया में आऊँ।और मेरा आपसे प्रॅामिस है आप भी फेमस हो जाओगी । मैं यहाँ पड़े- पड़े बोर हो गया हूँ। अभी यहाँ से गया पिछले महीने ही मेरा दोस्त गया और वह किसी नेता पर गिर फेमस हो गया उसका जूते का जीवन सफल हो गया अब मैं भी चाहता हूँ मेंरा जीवन सफल हो बन जाये।
मैंने कहा भई मैं तो तुम्हें नहीं चला पाऊंगी कोई और ग्राहक देखो जो तुम्हें चला सके....मैं वहाँ से एक चप्पल लेकर निकल गई पर पीछे कुछ स्वर मेरा पीछा करते हुए घर तक चले आए.......
"चाह नहीं पैरों में पहना जाऊँ
चाह नहीं सुन्दरी के पैरों की शोभा बढाऊ
चाह नहीं शो रुम में चमकू
चाह नहीं खिड़ाली का विजय इतिहास बनूँ
चाह नहीं मँहगे कारपेट्स को रौंदूँ
चाह तो है बस किसी नेता पर फेका जाऊँ .....फेका जाऊँ....फेका जाऊँ ।।
पेशा पढ़ाना ..... लिखना शौक और ज़रूरत है ।खुल्ला पत्रकारिता ,सामाजिक ऐब और कलम !!😊😊
9/10/2016
जूते की चाह (व्यंग्य लेख )
भाई चारे का चारा ( व्यंग्य लेख )
ओये चुनिया ,मुनिया,धनिया हमरे बुडबक भाइया फेर जीत गवा रे....बड़ा भारी सिटवा आवा रे कउनो टिकै न पावा सब यादव भाई एक जुट हुई गवा ,त कउनो पार न पावा.....अब ई चायवाले (मोदी) भइया को कउन समझावे दूध से जरैं के बाद भी (दिल्ली हार) न समझै । बिहार महागठबंधन विजय 🏆अब खूब फलफूल रहा है ,आगे समय में जाने और कितने गुल और क्या रंग लायेगी पर कुछ राजनीतिक जानकारों का मानना है कि फिर बिहार में एक बार जंगल राज की वापस हो आ गया है ये कयास .....कयास ही न ही रहे , बल्कि लोगों के दिलो कि ख्वाहिश पूरी भी हो गयी ।
उधर बिहारी दादू,दबंग भाइयों के मन मनो लड्डू फूट चुके हैं, आखिर हो भी क्यों न एक बार फिर दबंगइ का जादू बिखेरने को जो मिलने वाला है ,जाने बिहार में भ्रष्टाचार होगा या भ्रष्टाचार में बिहार मे बहरहाल बयार आना तय है ।
तो उधर बीजेपी घराने के नेता यूँ लगा जैसे अपने ही कुनबे की पराजय की बाट जोह रहे थे ताकि वो पार्टी के अन्दरूनी विरोध झेल रहे सदस्यों के खिलाफ सीना पीट -पीट रूदाली बन सके, लगा जैसे एक ग्रुप मोदी के खिलाफ लामबद्ध हो चुके हो ,तो मोदी और शाह की शहंशाही घटते ही कुछ बुजुर्ग सरदारों ने भी तीर 🎯कमान साधते देर न लगाते ।
ये मोदी की घटती लहर है या नीतीश का भाजपा में व्यक्तिवादी विद्रोह की अटूट और असाधारण प्रभाव निकला ।बिहार हार की असर का तासीर राजनीतिक दलों में बिलकुल अलग -अलग रही।मोदी को बिहार की हार से थोडी सीख तो अवश्य मिलीं होगी कि वंचित वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग में अपनी साख फिर से वापस लौटाए और मध्य वर्ग के पुराने आधार को भी मजबूत करे । तो जानकारों का अंदाज़ा है नीकू का ( नीतीश कुमार ) वही हाल होगा जो कभी माझी का हुआ ,नीकू कहीं लालू के इक्के बन कर रह गये हैं ।
बिहार की बेचारी जनता का क्या होगा । बिहार के पाणिग्रहण राजनीति ने एक बार दूसरे शाह के मैनेजमेंट व चुनावी रणनीति पर सोचने पर मज़बूर कर दिया । गुजराती शाह के आगे बिहारी शाह (लालू ) का चुनावी जुमला काफी कारगर रहा " जब तक रहेगा समोसे में आलू 🍠,तब तक बिहार में रहेगा लालू " बिहार की जनता ने लालू के परिवारवाद की परम्परा को बढ़ाकर लालू को तीस मार खां की कहावत से नवाज़ दिया ।
अब लालू के मदारी खेल में नीकू कौन -कौन से गानों में गुलहटी मार-मार कर करतब दिखायेगे और मनभावन व मनोरंजक होगा आने वाले पांच साल बतायेगें । बिहार पाणिग्रहण भइ चारे के चारे का स्वाद बिहार की जनता को स्वादिष्ट लगे या फीका पर नीकू को मजबूरन ये चारा स्वादिष्ट 😋बनाना ही होगा ।
घोडो को मिलती घास (व्यंग्य कविता )
घोडो को मिलती घास
गधे खा रहे अनानास
झाड़ फूस को आस
जाने कब बने अमलतास
बजते ढोल ,बीन और तास
बहरे बन बैठे अमीरदास
बड़े - बड़े यहाँ तमाश
स्वारथ पर ही सबका विश्वास
भ से भरोसा,भ से भड़ास
झूझत जनता चुनाव बाद
कऊवा पहनते हैं लिबास
हँस झेले दुख पचास
बीमार मानसिकता (लेख )
बीमार मानसिकता ।(लेख समाज स्तम्भ हेतु ) शशि पाण्डेय
जब भी बलात्कार की घटनाएँ घटती हैं घटनाएं हम सबको झकझोर कर रख देती हैं । हम आज़ आधुनिक समाज की दौड़ मे बेतहाशा भाग रहे हैं । पर लाख टके का सवाल कि क्या हम और हमारा पुरूष समुदाय आधुनिक हो पाये हैं ? लाखों -लाखों सवाल हम सबके ज़ेहन मे उठने लगते हैं , या उठते होंगे क्या हम सब जैसा समाज चाहते हैं यह बिल्कुल वैसा ही है या उससे अलग ! कानून बनने के बावजूद पूरे देश में बलात्कार की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। आये दिन ऐसी घटनाएं अखबारों की हेड लाइन बनती हैं ।
अमूमन ऐसी घटनाओं के बाद सरकारें व सत्तारुढ़ राजनीतिक पार्टी इन पर पर्दा डालने में जुट जाती हैं और विपक्ष और दूसरे सामाजिक संगठन धरने और प्रदर्शनों में लग जाते हैं । लेकिन घटना के मूल कारण की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। अथवा ध्यान दिया नहीँ जाता ।
आखिर ऐसे कुकृत्यों की वजहें क्या हैं ? क्यों आधुनिकता की ओर बढ़ता, पढ़े - लिखे समाज मे महिलाओं के प्रति ऐसी दरिंदगी घटने के बजाय बढ़ती ही जा रही है । हम गंदी मानसिकता या विकृत मानसिकता कह कर मोमबत्तियाँ जला कर चुप नही बैठ सकते । समाज कॊ समझना होगा इसके पीछे क्या वजहें हैं और उन वजहों का हल क्या है !
आंकड़े बताते हैं देश मॆ प्रदितिन औसतन 92 महिलाओं का बलात्कार होता है । नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में साल 2012 में रेप के 24,923 दर्ज हुए, जो 2013 में बढ़कर 33,707 हो गए। 2013 में15,556।
और अब ये आंकड़े बढ़ते ही जा रहे हैं । अगर हम यह मान लें कि इसके पीछे की मुख्य वज़ह अशिक्षा और बेरोज़गारी है तो यह भी आरोपियों कॊ देखते हुये गलत साबित होता है। कितने ही आरोपी ऐसे हैं जो पढ़े लिखे शिक्षित होते हुये भी ऐसे कामों मॆ शामिल पाये गये हैं । ऐसे आरोपियों के लिये महिलाएँ मनोरँजन से ज्यादा कुछ नहीँ ।
समाज मॆ ख़त्म होते संस्कार हमें किस दिशा की ओर ले जा रहे हैं । बढ़ते अपराधों और नारी उत्पीड़न की घटनाओं से यह साबित होता है कि नैतिक मूल्यों का अब कोई मोल नहीं रहा है । सिनेमा जगत व विज्ञापन की दुनिया में बेवजह महिलाओं कॊ वस्तु रुप मॆ परोसा जाना परिवार तथा समाज कॊ संक्रमित कर बीमार करने का काम कर रहा है । आज़ भी महिलाएँ सताई जा रही हैं । उनको मानसिक, शारीरिक रुप से प्रताडित किया जा रहा है ।
पितृ सत्तात्मक समाज मॆ महिलाओं के प्रति हिंसा तो उनके गर्भ काल से ही शुरू हो जाती है । लड़कियों कॊ बोझ समझना यह मानसिकता भी हिंसा का हिस्सा है ।
विचार करने वाली बात है क्या बलात्कार प्राकृतिक जगत में पाई जाने वाली प्रवृत्ति है ? प्रकृति में बलात्कार नहीं हो सकता और सामूहिक बलात्कार तो बिल्कुल नहीं।कानून बनने के बावजूद पूरे देश में बलात्कार की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं. रोजाना ऐसी घटनाएं अखबारों के किसी न किसी कोने में नजर आ जाती हैं.
इस तरह अपने अस्तित्व और पहचान के जटिल प्रश्नों से उलझने वाली प्राणीजगत की श्रेष्ठतम मानव जाति इस प्राकृतिक जगत की सबसे अप्राकृतिक प्रवृत्ति की शिकार है और इस प्रवृत्ति को पाशविक कहना पशुओं की प्राकृतिकता का अपमान होगा। इस बारे में हम इशारा भी नहीं करना चाहते हैं. यही समाज मॆ बलात्कारी मानसिकता का हिस्सा बन जाता है। भौतिकता या शारीरिक आकर्षण का विलासी लक्ष्य दरिंदगी और हवस कॊ अंजाम देता है ।
इस तरह बलात्कार मानव सभ्यता का विकट संकट है। अब तर्क दिया जा सकता है कि बलात्कार तो कुछ ही पुरुषों द्वारा किए जाते हैं, इसके लिए क्या संपूर्ण पुरुष समाज व्यवस्था को पशुओं से बदतर माना जाना चाहिए ? बलात्कार और दूसरे अपराधों में बुनियादी फर्क है ? ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए हमारे पितृसत्तात्मक समाज की मानसिकता में बदलाव के लिए ठोस कदम उठाने जरूरी है. लेकिन इस मामले में कानून बेबस है. यही वजह है कि सरकार ने अब तक जो कानून बनाये थे वह भी दंतविहीन बन कर सरकारी दस्तावेजों तक सिमट कर रह गया है
समाज कॊ गंदगी परोसने वाले कब समझेंगे ! जब ऐसे मुद्दे उठते हैं तो तमाम कुतर्क स्वरूप लम्बी बहस छिड़ जाती है और आधुनिकता ,सामजिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि नदी के दो छोरों की तरह भिन्न है. बावजूद इसके अगर इनकी जुबान से मिलते-जुलते शब्द निकल रहे हैं तो इसके लिए देश की वह पुरुष मानसिकता ही जिम्मेदार है जिसमें आज भी महिला को भोग्या समझा जाता है.
इस पूरे मामले कॊ मनोवैज्ञानिक तरीक़े से समझने और सुलझाने की तरफ़ क़दम बढ़ाने की ज़रूरत है । दूसरी बात महिलाओ कॊ भी अपने आँख ,कान खोल सतर्क रहना होगा। मीठी -मीठी बातों के पीछे छिपे छलावे कॊ पहचानना होगा । जब तक महिलाएँ सम्वेदनाओ मॆ बह कर काम करेंगी तब तक धोखा और कुकृत्य संकट के बादलो का खतरा उन पर मंडराता रहेगा । ऐसे भयानक दौर मॆ महिलाओ कॊ स्वयं कॊ बहुत सुरक्षित रख कर चलना होगा ।
शशि पाण्डेय ।
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Poonam109@gmail.com
क्योंकि !हम सम्वेदनशील हैं ।(व्यंग्य लेख )
क्योंकि !हम सम्वेदनशील हैं ।
सुबह -सुबह का समय सूरज बाबा अपने आगमन की दस्तक दे रहे थे । हम भी औरों की तरह रोज़ी -रोटी के जुगाड़ के लिये तैयार हो रहे थे । तैयार हो घर से निकल लिये । रास्ते किनारे एक साइकिल सवार धीरे -धीरे पैडल मार आराम से चल रहा था शायद वो भी पेट के जुगाड़ मॆ सुबह -सुबह निकल रहा होगा ।
दूसरी तरफ़ से फर्राटा भरती हवा से बातें करती हुई कार आयी और साइकिल सवार कॊ हवा मॆ उछालते हुये...ज़रा देर घायल हुये साइकिल सवार के पास ठहरी और फ़िर लोगों से बचते हुये भारतीय परम्परा अनुसार निकल भागने के सफ़ल प्रयास करता हुआ भाग निकला।
उसके बाद घायल साइकिल सवार के पास लोगों का जमघट शुरू हुआ. कुछ लोग दूर से ही उसे देख सम्वेदना व्यक्त कर रहे थे ,तो कुछ थोड़ा पास जाकर । जिनके हाँथ स्मार्ट फोन थे वो अलग तरीक़े से सम्वेदनशील होने की गवाही दे...खिचैक-खिचैक उस गरीब घायल की तस्वीरें कैद कर रहे थे । मानो वह कोई रियो ओलम्पिक विजेता हो!
उसकी सांसे भी आखिर उसका कितना साथ देतीं...कोई तड़प कर कैसे पल -पल मौत के आगोश मॆ समाता है इस वैज्ञानिक क्रिया का सम्वेदनशील लोगों के द्वारा वीडियो बनाये जाने और फोटो उतारे जाने तक या जीवन लीला समाप्त होने तक ।
सारे फोटो ,वीडियो सोशल मीडिया मॆ उंडेल दिये गये होंगे क्योंकि वे सब दुःखी थे इस घटना से और अत्यंत सम्वेदनशील भी थे । रोज़मर्रा की ज़िंदगी मॆ हम सबके सामने ऐसी छोटी -बड़ी घटनाएँ रोज़ घटती रहती हैं और हम यानि "समाज" जो वर्तमान समय मॆ घोर सम्वेदनाओ से लबरेज़ है ।
सड़क दुर्घटनाओं मॆ दम तोड़ती जिंदगियां और उनकी फोटुये उतारते और वीडियो बनाते हम...उनको देखने के बहाने से उनकी जेबों से गाँधी की तस्वीरों वाले काग़ज़ के टुकडे और मोबाइल खींचते हम ,क्योंकि हम सम्वेदनशील हैं ।
मामला सिर्फ यहीं समवेदित होने तक नहीँ , म़हिलाओं के साथ बढ़ते अत्याचार और सतर्क होते हम । हम सब इतने सतर्क हो चुके हैं कि, कहीं कोई भी किसी की बेटियों ,महिलाओ पर फब्तियां कसता है तो सोच अनदेखा कर किनारे हो लेते हैं कि कौन सा हमारे घर की बात है,क्योंकि हम सम्वेदनाओ कॊ समझते हैं ।
हम और हमारी नई पीढ़ी और भी ज़्यादा सम्वेदनाओ और जोश से भरी है । किसी की मदद के लिये हाँथ बढ़े या नहीँ पर कैंडिल मार्च के लिये हाँथ ज़रूर बढ़ाते हैं । कैंडिल मार्च से ज़्यादा सेल्फी मार्च के लिये सम्वेदनशील जो होते हैं। सेल्फी जिसका हमारे मन -वचन -कर्म के साथ हमारा एग्रीमेंट हो चुका है ।
ट्विटर ,फेसबुक ,ह्वाट्स्प ,ब्लॉग और जाने कौन -कौन सी सोशल दुनिया जहाँ पर हम और हमारे जैसे सम्वेदनशील लोग अपनी सम्वेदनाएँ व्यक्त करने के लिये सारे काम छोड़ देते हैं ।
काश कि भड़ास रूप मॆ निकलती हमारी सम्वेदना सिर्फ़ दिखाऊ ,खोखी सम्वेदना मात्र न होती । दिखाने के दाँत और खाने के और....मॆ दुनिया क्या से क्या हो चली है । ऐसे मॆ जावेद जी की ये लाइनें काफ़ी सटीक बैठती हैं....
इस शहर में जीने के अंदाज़ निराले हैं....
होंठों पर लतीफ़े हैं, आवाज़ में छाले हैं..!
साफ़ -सुथरी छवि परोसते लोग मौका परस्ती से नहीँ चूकते । होटलों मॆ बादशाहत दिखाने के लिये टिप देते सम्वेदनशील लोग रास्तों मॆ गरीबों के हाँथ फैलाए जाने पर जेबों मॆ सिक्कों कॊ ढूँढ़ने मॆ एनर्जी जाया करते हैं । और कई बार सिक्के ढूँढ़ने की भी ज़हमत नहीँ उठाते ।
दुखों और घटनाओं के स्तर अनुसार सम्वेदनाओ के भी स्तर भी होते हैं ,कब ,कितनी,कैसी वाली सम्वेदना व्यक्त करनी है । इतना ही नहीँ कई बार सम्वेदनाएँ राष्ट्रीयता से ऊपर ,राजनीतिज्ञों कॊ समर्पित हो जाति -पांति मॆ बटी होती है । कुछ सम्वेदनाओ के प्रकार पर नज़र.....
1-खेलीय सम्वेदनाएँ
2-राजनीतिक सम्वेदनाएँ
3-जाति -पाति की सम्वेदनाएँ
4-महिलाओ के प्रति सम्वेदनाएँ
5-बच्चो के प्रति सम्वेदनाएँ
6-पडोसी मुल्कों के प्रति सम्वेदनाएँ
7-आपदाओं ,घटनाओं से प्रभावित लोगों के प्रति सम्वेदनाएँ
अगर बात खेलों की हो तो पूरे देश के लोगों की सम्वेदना एक सी होती है ,मतलब जीते तो सब खुश...हारे तो सब गरिययायेँगे और गरिययायेँगे ही नहीँ खानदान ,गर्लफ्रेंड आदि -आदि तक पहुँच जाने मॆ कोई कसर नहीँ छोड़ते ।
बात अगर राजनीति की हो तो सम्वेदनाएँ दलों के हिसाब से व्यक्त होती हैं । कुछ तो इतने पक्के चेले होते हैं कि मारो -मार मॆ उतर आते हैं ।यह राजनीतिक सम्वेदना का स्तर पूरे देश मॆ सबसे ज्यादा दक्षिण भारत मॆ चरम मॆ पाया जाता है । कितने लोग इसके चलते जान गँवा चुके हैं ।
जाति -पाति की बात छिड़ते ही लोग जातीय हो जाते हैं । एक अलग तरीक़े की सम्वेदना...बहने लगती है ।इन सम्वेदनाओ मॆ कोई किसी से दबता नहीँ है । सब सम्वेदनशील हो अपने -अपने कॊ महान बताने मॆ ज़बानी जंग छेड़ देते हैं ज़रूरत महसूस हुइ तो गाली -गलौज ,हाथापाई तक आगे बढ़ जाते हैं । इससे भी आगे भी सम्वेदनाएँ निकली तो बात समुदायों के बीच दंगे तक जा कर निपटती हैं ।
महिलाएँ अहा ! ये नाम आते ही आधा समाज बेचारगी की सम्वेदना के चश्मे से देखना शुरू कर देता है । और इनके साथ कोई घटना घट जाये तब तो सम्वेदनाओ का नज़रिया 6.6 से घट कर 0.1 हो जाता है । जितनी आँखे फाड़ कर देखने मॆ नम होती हैं , उतनी ही नम ,आँख फाड़ घटनाओं कॊ जानने मॆ!ये सम्वेदनाएँ महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के लिये जागे न जागे...अनहोनी होने के बाद तीव्रता से सम्वेदनाएँ प्रेषित होती हैं ।
इसी तरह बच्चो के मामलात मॆ tv ,अखबारों या किसी के मुँह से सुनते हुये हम बेहद सुलझे और दार्शनिक बन बैठते हैं । लेकिन यही बच्चे जब घरो ,दुकानों और दफ्तरों मॆ काम करते मिलते हैं तो हमारी सम्वेदनाएँ होलिका मॆ दहन हो चुकी होती हैं । आखिर हम कब समझेंगे चीजो कॊ । असल मॆ हम इंसान कब बनेंगे ? यह प्रश्न जब तक जहन मॆ टकरायेगा हमारी बाज़ारु हो चुकी सम्वेदनाएँ सिर्फ़ और सिर्फ़ काग़ज़ के फूल साबित हो कर सबको दूर से प्रलोभित करती रहेंगी ।
देश के पडोसी मुल्कों की बात हो उनमे भी बात पाकिस्तान की हो तो हमारी बदले वाली सम्वेदना काम करने लग जाती है और हम जाति ,धर्म ,लिंग भेद से परे हो जाते हैं । प्राकृतिक आपदाओं जैसे वर्षा बाढ़ , अकाल सूखा आदि घटनाओं पर तो कई बार हम देखते ,पढ़ते ,सुनते रो पड़ते हैं । लेकिन लाशों के बदन से जेवरात , जेबों से पैसे निकलना गुरेज नहीँ । आपदाओं मॆ फँसे लोगों से लूट मॆ सुप्त सम्वेदना काम करती है जो सो चुकी होती है ।
सम्वेदनाओ और भी बहुत प्रकार से बाँट कर देखा जा सकता है । आखिर ये हमारी अपनी सम्वेदनाएँ हैं हम जैसे चाहे सुविधानुसार खर्च करें । किसी के बाप का क्या जाता है....ये बाप पे नहीँ जाने का...ऐसी सम्वेदनाएँ मॆ प्रायः ऐसा ही रिएक्शन मिलता है ।
खैर ये सब छोडिये ,अब वो साइकिल सवार जो घायल हो चुका था किसी ने थोड़ी अच्छी वाली सम्वेदना के चलते 100 नम्बर मॆ फोन कर पुलिस कॊ सूचना दे दी...दो थाने वालों की सम्वेदनाएँ आपस मॆ टकरा रही हैं उनका अपना -अपना कहना यह घटना उनके थाने के अन्तर्गत नहीँ आता...घायल मुसाफ़िर का जीवन अभी शेष बचा है या नहीँ ,मालुम नहीँ... सुरक्षित बची हैं तो हमारी कोरी सम्वेदना...क्योंकि !हम सम्वेदनशील हैं ! ©शशि पाण्डेय ।shashiipandey.blogspot.com
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दोस्त कहते हैं (व्यंग्य कविता )
दोस्त बोलते हैं
हम हँसते बहुत हैं
और हम न हँसे तो
"क्यू नहीँ हँस रही"
टोंकते बहुत हैं
ज्यादा क्या कहें
हमें चुप देख
हमारे मुँह मॆ ज़बान नहीँ
कुछ लोग
भौंकते बहुत हैं ।
परिंदे दो प्यार के ( कविता )
परिंदे दो प्यार के
जब आपस मॆ लड़ते
जाते हैं भूल याराना
करते बस अपना - अपना
तू -तू ,मै -मै दिल करता
तोड़ते इक दूजे का सपना
परिंदे दो प्यार के
जब आपस मॆ लड़ते
अटूट प्रेम होता खंडित
होती बस ईर्ष्या सज्जित
कटघरे मॆ ,तो दूजा जज
फ़िर होता रिश्ता लज्जित
परिंदे दो प्यार के
जब आपस मॆ लड़ते
देख कभी जो आहें भरते
उफ़ -उफ़ करते अब न थकते
जानू ,जान ,जानम , जानेमन
अब तो बस सपनों मॆ करते
परिंदे दो प्यार के
जब आपस मॆ लड़ते
जाने क्यों करें हैं दईया-दईया
जब इक दूजे के बने खेवइया
फ़िर लड़ने बैठे तो
बन जाते लरकाइयां
परिंदे दो प्यार के
जब आपस मॆ लड़ते
संसार मॆ दो जोडो का सार
साथी बिन दूजा मझदार
क्यों फ़िर रखते दरकार
बाती , दिया बिन बेकार
परिंदे दो प्यार के
जब आपस मॆ लड़ते
©® शशि पाण्डेय ।
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ख़याल
बद्ख़याल उनका कि हमें ख़याल नहीँ ख़याल उनका इस क़दर की और कुछ ख़याल नहीँ
बीमार ए हाल जो उनसे पूछा
हाल उनका हमें बीमार कर गया ॥
तुम वो तो नहीँ (कविता )
सोचा जो था मैने, तुम वो नहीं
पानी है ,मंजिल, मेरे उसूल झुकते नही
मिले हैं पंख तो आसमां मे उडू
सोचा है जो,क्यों न मेरे मन की करूँ
रंग गुलाबी है मेरे सपनों का
इन सपनों से मै मेरा आसमां भरुं
सोचा जो था तुम वो तो नहीं
पानी है ,मंजिल मेरे उसूल कम नही
परवाह नहीं ,कुछ भी मैं क्यों सोंचूं
बना रहे आगाज, जो हुआ है शुरू
हौंसला है बुल्लंदियो को छूने का
हसरतों को कैद मुठ्ठी मे क्यू करूँ
सोचा जो था तुम वो तो नहीं
पानी है मंजिल मेरे उसूल कम नही
छूटा है जो पीछे ,छोड़ आगे चलूँ
रास्ते हैं नये -नये ,रोड़े खुद बिन लूँ
शिकायत नहीं किसी की शिकायत का
कैसा भी हो रास्ता बिना रुके बढ़ लूँ
सोचा जो था तुम वो तो नहीं
पानी है मंजिल मेरे उसूल कम नही
रात है घनी खुद सितारों से रोशन करूँ
तम है बाकी तो मातम क्यू करूँ
इंतज़ार है बस लालिमा से भरे भोर का
सूरज उगता है जहाँ रुख़ उधर कर लूँ
सोचा जो था तुम वो तो नहीं
पानी है मंजिल मेरे उसूल कम नही
सोचा जो था तुम वो तो नहीं
पानी है मंजिल मेरे उसूल कम नही॥
©®शशि पाण्डेय
कभी आओ तो (कविता )
कभी आओ तो ऐसी साँझ
फ़िर मेरी शाम खिल जाये
भोर की लाली यूँ ही
साँझ की लाली से मिल जाये
एक ख़याल जो तुमसे
सुबह था बिछड़ गया
तुम्हारे अहसासों के साथ
बातो में तेरी घुल पूरा हो जाये
चढ़ी चाय चूल्हे पर
अकेला प्याला इंतज़ार में
दूसरे प्याले का जो मिले साथ
चाय की फ़िर महफिल लग जाये
पेपरों के उड़ते पन्ने
जो पढ़े तो तुमने सुबह
चाय संग उसकी खबरें
सुनाओ तो मुझमें ढंग आ जाये
तेरी यादों से बोझिल दिन
थोड़ा कर -कर सरकाया
फ़िर हों न बिछ्डे लम्हे
आओ न मिल कोई गीत गुनगुनाये॥
©® शशि पाण्डेय ।
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अब गुरु से कुछ नहीँ होत है (व्यंग्य लेख )
ओये सर जी मारे साथ सिद्द्धे पेश आओ नहीँ ते एक मिन्ट मै तबादला हो जावेगा ! जय हो डॉo सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जी । जय हो सारे हमारे गुरुओं की । हमारी जय हो न हो क्योंकि हम भी गुरु हैं लेकिन आधुनिक समाज के बच्चो के।
आज़ की "राजी" नीति का एक सुप्रसिद्ध तकिया कलाम थोड़ा फेर बदल के साथ मौजूदा शिक्षक कौम पर क्या खूब फबता है "वो हमें परेशान करते रहे..और हम परेशानी ढोते रहे "
गुरु - शिष्य की लुप्त हो चुकी आदर्श परम्परा अब बहुत कुछ..."चले मुस्सद्दी ऑफिस -ऑफिस" के मुस्सद्दी की तुल्य हो चुकी है। भयावह हास्य की जगह करुणा का विस्तार होने लगता है ।
भयभीत विचलित हुआ इस प्राणी के खमियाजा का असर आधुनिक शिष्यों पर खूब दिखता है । बुद्धिवाद ,विज्ञानवाद सब धराशायी हुये मुँह की खा पड़े हैं । श्रद्धा के विरोधी भाव निर्मम ,निरंकुशता उबाल के साथ उतर बह चली है ।
यह परम्परा अब एकलव्य -द्रोणाचार्य तक सीमित नही ! अब यहाँ जूली और रोमियो भी मिलते हैं । वैसे पहले भी मिलते रहे होंगे पर लोगों कॊ पता नही लगता रहा वज़ह सोशल मीडिया जो नही था । वैसे हर्षौल्लास बना रहे जीवन मे तो सबके लिये अच्छा ही होता है ।
मौजूदा सरकारो के द्वारा उच्च नियम बनाये जाने के साथ -साथ विश्लेषण किये जाने की ज़रूरत है । निष्क्रिय हुये पड़े मनुष्य रूपी इस कौम के मनो कॊ कैसे जगाया जाये । ताज़ा चाय या बाग बकरी चाय पिला तरोताज़ा किया जाये ।
शिक्षकों कॊ यह कैसे सिखाया जाये कि कक्षाए, अगर आदर्श कक्षाओ के मापदंड कॊ पूरा नही करती तो चालीस बच्चो से इतर एक सौ से...एक सौ पैंतीस ,चालीस बच्चे कैसे ढोया जायें शायद इसकी दक्षता के लिये चरवाहों से प्रशिक्षण दिलाना चाहिये ।
पढाने के साथ - साथ खाना बनाने से लेकर खाना परोसने तक के प्रशिक्षण के लिये क्यों न गुरू जी लोगों कॊ होटल मैनेजमेंट का कोर्स कराया जायें...कभी -कभी ये हुनर घरो मे पुरुष वर्ग के गुरु जी लोगों कॊ शांति बहाली मे भी साथ देगा ।
दवाइयां बाँटते गुरू जी...कभी खुद क्या हैं भूल ,उद्दात्त हो सरकारी पैसे बच्चो कॊ बाँटते..अतुलनीय गुरू -शिष्य की परम्परा का निर्वाह करता ये अद्वितीय प्राणी । यह ईश्वरीय आलोक का स्वरूप प्राप्त कभी - कभी मक्कारी के ढर्रे पर भी चल पड़ता है । हालाँकि ऐसी मक्कारियांक करते हुये आलोचक बन खुद का मूल्यांकन ज़रूर करता होगा ।
ऐसी ही एक शिक्षिका जो कि अध्यापन कार्य छोड़ दिनरात बच्चो के बैंक अकाउंट ,आधार कार्ड के कार्य मे जूझीरत रहती है...उसे देख एक दिन मेरे मन मे आया उसको बोलूं..सुनो प्रिये तुम ऐसे बैंक का काम करते हुये , लीन बिल्कुल बैंकर् लगती हो ।
कार्य कोई भी हो, कोई अपना अस्तित्व नही खोना चाहता जबकि यहाँ...देश का भावी भविष्य नियामक का अस्तित्व चूर -चूर चकनाचूर कुयें के मेढ़क भाँति टर्राता रहता है। लेकिन स्कूल सृष्टि मे इस महाशून्य का सफ़रनामा जारी है ।
कुछ गुरूजनीय असाध्यवीणा सन्नाटे के साथ कौशल का निर्बाध स्पंदन करते हुये वीर योद्धा भी साबित होते हैं जिनको देख कई आलसी प्रवृति अस्तित्व गुरुजनों के छाती साँप लोटने जैसी हो जाती है । यह निरीह प्राणी अपने प्रति होते अत्याचार का विरोध करे तो कैसे उसके इस क्रांतिकारी स्वरूप कॊ लफ्फाजी का रंग दे बखिया उधेड़ते तनिक देर न लगती ।
हे समाजिक बोध के दाता, ध्वनि वाहक , वाणीवत्सल ,सुशुमित -शांत बहती रस धारा के परम प्रवाहक गुरु तुम असाधारण हो..तुम कैसे गुरु -शिष्य परम्परा का एकलव्य बन कुशल निर्वाह करो ये तुम्हे गहन चिंतन करना होगा....वरना सब यही कहते फिरेंगे....गुरु से कछु नहिं होत