7/28/2016

समीक्षा -मालिश पुराण (व्यंग संग्रह )

कभी -कभी साहित्य पढ़ने के उपक्रम मे कुछ ऐसा मिल जाये जिसको पढ़ कर पाठक को बोध लगे ,यकीनन उस साहित्य का साहित्यक इतिहास मॆ उत्कृष्ट स्थान योगदान माना जायेगा ।

ऐसे पढ़ने के उपक्रम मॆ "मालिश महापुराण" व्यंग्य संग्रह पढ़ा जिसके किसी -किसी लेख को एक से दो बार भी पढ़ा । संग्रह के एक लेख के कुछ अंश...

"लोग कहते थे नया हो जा पुराना पन उतार
मै भी क्या करता सरे बाज़ार नंगा हो गया"

मै भी कुछ ऐसा ही सोच रहा हूँ ।वैसे अपने हरिशंकर परसाई भी कह गये हैं कि साहित्य मॆ नंगई का पेमेंट अच्छा होता है ।

मै भी इस सुभाषित मॆ साहित्य के साथ समाज भी जोड़ना चाहता हूँ ।दूसरी बात ,बाज़ार आज़ हम्माम हो गया है जिसमे सभी एक से दिख रहे हैं ।

मै कुछ और वेन्यू सोच रहा हूँ ,जहाँ कुछ नया -नया सा महसूस हो सके ("नया और नया" शीर्षक से )"

व्यंग्य ऐसी विधा जिसके तरकश मॆ समाज के सारे ऐबों को निशाने मॆ लेने के लिये तीर मौजूद रहते हैं ।

कौन सा तीर कहाँ और किस ढंग से साधा जाय यह बात लेखक का तीर यानी लेखक कि कलम तय करती है। इसी हुनर का एक नमूना पढिये जो की लेखक का दावा कि यह उसका पेटेंट है...यह साहित्यिक विधाओं के संग्रहों का विवरण है  किसी दवा के माफिक है...

"कविता संग्रह की डिबिया
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किसी संग्रह के आवरण चार पर लिखना चाहिये --ईच 500 एमजी कविता कन्टेन्स एक्स्ट्रैक्ट आफ़ :

1.केदारनाथ कलौँजि..50mg
2.फ़ैशन फिनाएल....100mg
3.स्फीति सर्पगंध......200mg
4.अनुभव अलसी....005mg
5.प्रतिभा पतीसा....005mg
6.भ्रम भिंडी.........40mg
7.पुरस्कारेच्छा.....100mg

जाहिर है यह विवरण अलग -अलग संग्रहों के लिये अलग -अलग होगा ।मैने तो बस एक राह दिखायी है ।युग पुरुष इसके अलावा और कर भी क्या सकते हैं ।"

इस व्यंग्य संग्रह के लिये लेखक ने मालिश के प्रकार ,स्थिति और तरीकों व जरियो पर निश्चित गहन मंथन किया है जैसा की रचनाओं मॆ साफ दिखता है ।

संग्रह मॆ रचनाओं की सधी हुई हिंगलिश दाल मॆ तड़का सी महकती है। एक से बढ़कर एक नये विषय व उन विषयों पर चाटुकारिता के चरम को उजागर करती वक्रोक्ती।

ठहरा हुआ पानी गन्दला होकर अपनी स्वच्छता और पारदर्शिता खो देता है ,भाषा का ऐसा ही नियम है ।आपकी भाषा बहती हुई सहज धारा सी प्रवाह होती है । जो आपके मनोभावों की व्यंजना करती गयी ।

लेखक द्वारा कही जाने वाली बात को शब्दों के हलक से निकलवाना आसान नहीँ, लेकिन यह हुनर सुशील जी को बखूबी आता है । किताब मॆ व्यंग्य लेखों मॆ व्यंग्य कविताओं का तड़का लेखों का सौंदर्यवर्धन करता है ।

            "हिम पिघलते ही अभिमान का ,
              सूर्य निकला समाधान का ।
              आदमी मॆ ही मौजूद है ,
              मत पता पूछ शैतान का ।"(मोगैम्बो खुश नहीँ होते ) शीर्षक से ।

संग्रह मॆ विषयों की संजदगी दिखाती है कि लेखक कितना संजीदा और विचारशील है । रचनाओं मॆ आंतरिक अन्विति और शैल्पिक गठन दोनो मिलकर आपकी रचनाओं को बेजोड़ बनाते हैं ।

आपकी रचनायें हम जैसे सीख बाजो के लिये ,खाने मॆ क्या डाला जाये कि स्वाद बढ़े कुछ इस तरह से है । मै पूरे दावे से कहती हूँ  "मालिश पुराण" पठनीय और संग्रहणीय है ।

बात किताब के आवरण की ,की जाय तो आवरण मॆ  शहरी भाषा मॆ "पुतले" का और ग्रामीण भाषा मॆ "धोखार" का चित्र है जिसका उपयोग प्राचीन समय से खेतों मॆ आये जानवरों को भगाने के लिये किया जाता था और वर्तमान समय मॆ राजनीतिक परिप्रेक्ष्य मॆ भी खूब किया जाता है ।

चित्र चूँकि पुतले का है जो की निर्जीव इंसान को  दर्शाता है आज हम सब भी स्वार्थ मॆ असहाय और निर्जीव हो चुके हैं । व्यंग्य संग्रह का समाज मॆ होने वाले चाटुकारिता पर करारा प्रहार है ।

मुझे  पूर्णतः विश्वास है आपकी अफलातूनी कलम यूँ ही निर्बाध ,बेबाक चलती रहेगी...आप लिखते रहे ,हम पढ़ते रहेंगे...इसी के साथ आपको व्यंग्य संग्रह "मालिश पुराण " हेतु बधाई एवम असीम शुभकामनाएँ ।

व्यंग्य संग्रह - मालिश पुराण ।
लेखक     -- सुशील सिद्दार्थ ।
समीक्षक -- शशि पाण्डेय ।
आवरण -- बँशीलल परमार ।
प्रकाशक --किताब घर ,4855-56/24,
               अंसारी रोड ,दरिया गंज,नई
               दिल्ली--110002।
मूल्य ----एक सौ पचास रुपये मात्र ।

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